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A newspaper clip regarding Dr Vashishth Narayan Ji
भुला दिए गए गणितज्ञ डा. वशिष्ठ नारायण
May 12, 11:55 pm (Dainik Jagran)
अश्विनी वशिष्ठ, पूर्वी दिल्ली
डा. वशिष्ठ नारायण सिंह देश में किसी समय रामानुजम की कोटि के गणितज्ञ बन कर उभरे थे। मगर वक्त के थपेड़ों ने इन्हे बीते दिनों की दास्तान बना दिया है। वर्षो तक मानसिक आरोग्यशालाओं में भर्ती रहे इस महान गणितज्ञ को सिजोफ्रेनिया रोग से अभी तक मुक्ति नहीं मिल सकी है। समाज को भी इनकी याद नहीं। शायद यही वजह है कि राजधानी स्थित मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में भर्ती इस गणितज्ञ की सुध यहां के उन तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी नहीं है, जिनके नाम ऊंची हस्तियों में शुमार किए जाते हैं। हालांकि, डा वशिष्ठ के इलाज के लिए बिहार सरकार ने पहल करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखा है। वर्तमान हालात को देखते हुए चिकित्सकों का कहना है कि इलाज सारी उम्र चलेगा।
बिहार प्रांत के भोजपुर जिला स्थित बसंतपुर गांव में एक सिपाही के परिवार में 2 अप्रैल 1944 को जन्मे इस गणितज्ञ ने नन्हीं उम्र में ही अपनी प्रतिभा से सभी को हैरान कर दिया था। नेतरहाट स्कूल से दसवीं की परीक्षा में राज्य स्तर पर वर्ष 1963 में उन्हें प्रथम स्थान मिला था। इसके बाद उन्होंने पटना साइंस कालेज में इंटरमीडिएट में दाखिला लिया। जहां गणित में उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखकर कालेज के प्रोफेसर भी चकित रह गए। पटना विश्वविद्यालय की नियमावली में संशोधन कर उन्हें समय से पूर्व ही स्नातक की उपाधि दे दी गई। उसी दौरान अमेरिका से बर्कले यूनिवर्सिटी के प्रो.केली कालेज आए। वे भी काफी प्रभावित हुए। इसके बाद ही वशिष्ठ नारायण सिंह छात्रवृति पर बर्कले यूनिवर्सिटी चले गए। जहां उन्हे 'जीनियसों का जीनियस' कहा गया। उन्होंने बर्कले यूनिवर्सिटी में शोध व शिक्षण कार्य किया। अमेरिका में ही उन्हें डी.लिट व पी.एच.डी.की उपाधि मिली। उन्होंने अनेक विश्वस्तरीय शोध पत्र भी लिखे, जो विश्व भर में चर्चा का विषय बने।
अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी आफ वाशिंगटन में सितंबर 1969 से जून 1971 तक 1165 डालर की रिसर्च एंड टीचिंग की नौकरी छोड़ कर वे देशसेवा के जज्बे से लौट आए। कानपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी में मात्र 800 रुपये पर वर्ष 1971 से 1972 तक रिसर्च एंड टीचिंग का कार्य किया। इसके बाद वर्ष 1972 में ही वे सांख्यिकी संस्थान इंडियन इंस्ट्ीटयूट आफ टेक्नोलॉजी, कोलकाता में नौकरी पर चले गए। यही वह समय था जब उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में उनके साथ आई 86 वर्ष की उनकी मां ल्हासो देवी बताती है कि पत्नी वंदना रानी से भी उनके संबंध ठीक नहीं रहे। पत्नी से तलाक भी हो गया। बताया जाता है कि मानसिक संतुलन बिगड़ने का एक कारण यह भी रहा।
सिजो फ्रेनिया रोग की वजह से विक्षिप्त होने पर उनका इलाज डेविड अस्पताल व राजकीय मानसिक आरोग्यशाला, रांची में कराया गया। इसके बाद वे गांव लौट आए। उन्हे 5 अगस्त 1989 को रांची के एक चिकित्सक से दिखा कर उनके भाई ट्रेन से किर्की (पुणे) ले जा रहे थे। रास्ते में खंडवा स्टेशन पर 9 अगस्त 1989 को वे उतर गए और भीड़ में कहीं खो गए। करीब पांच वर्ष तक गुमनाम रहने के बाद उनके गांव के लोगों ने उन्हे छपरा में पाया तो वे गांव लाए गए। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी सुध ली। उन्हे विमहांस बेंगलूर इलाज के लिए भेजा गया। जहां मार्च 1993 से जून 1997 तक इलाज चला। इसके बाद वे गांव में ही रह रहे थे। तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री शत्रुध्न सिन्हा ने इस बीच उनकी सुध ली थी । स्थिति ठीक नहीं होने पर उन्हे 4 सितंबर 2002 को मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। उस दौरान करीब एक साल दो महीने तक उनका यहां इलाज चला था। स्वास्थ्य में लाभ देखते हुए उन्हें यहां से छुट्टी दे दी गई थी। लेकिन गत 13 अप्रैल को एक बार फिर उन्हें यहीं दाखिल कराया गया है। उनके भतीजे राकेश का कहना है कि पहले जब उन्हें दिल्ली लाया गया था तब भी वे उनके साथ थे, वर्ष 2003 से अब तक वे गांव में ही रहे। छात्रों को उन्होंने पढ़ाया भी लेकिन एकाएक चिड़चिड़ापन आने से उनका व्यवहार बदल गया। एक बार फिर उन्हें दिल्ली लाया गया है। इलाज के संबंध में साइकेट्री के विभागाध्यक्ष डा निमेश जी देसाई का कहना है कि उनकी स्थिति पहले से बेहतर है। शायद बढ़ती उम्र भी बीमारी की एक वजह बन गई है। डा. सिंह के इलाज के संबंध में अभी तक न तो केंद्र और न ही दिल्ली सरकार ने सुध ली है।
| [please, ishe padhne ka waqt nikale. i donot know name of its writer.] | 36 Kb |
Last Updated (Saturday, 20 February 2010 08:31)




Comments
Mera elaaj kuchh samay tak CMC Vellore(99-04) me chala.I was doing well & good at that time So,I left medicine.I was on YOGA & PRANAYAMA.In 2006 I felt again that Medicine is necessary.Till today I am continuing medicine with NIMHANS,Bangalo re.I am pursuing MCA at NIE,Mysore.I am among top 10 students of my college.
Isliye Psyzophrenia jisse Vashishtha Jee bhi grasit hain Uska elaaj purnatah sambhav hai...
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